World Best Story in Hindi

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  • Published : November 10, 2009
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प्रकाशक
यशपाल जैन
मंत्री, सस्ता साहित्य मंडल एन-७७, कनॉट सर्कस, नई दिल्ली-११०००१ ●
पांचवी बार : १९९९
प्रतियां : ३,०००
मूल्य : रु० ८.००

लेजर टाइपसेटिंग
बुकमैन लेज़र टाइपसेटिंग, दिल्ली-९२ ●
मुद्रक
आई.बी.एच, प्रिन्टर्स, मानसरोवर पार्क, शाहदरा

पाठकों से

जैसाकि नाम से पता चलता है, इस पुस्तक में हमने संसार के विशष लेखकों की चुनी हुई कहानियां दी हैं। ये कहानियां ऐसी नहीं हैं कि एक बार पढ़कर पुस्तक को पटक दें। ये कहानियां बार-बार पढ़ने योग्य हैं। इन्हें पढ़ने में जहां आनंद आता है, वहां जीवन की बहुत-सी आवश्यक बातों के संबंध में सोचने का अवसर भी मिलता है। प्राय: सभी कहानियों के पीछे कोई-न-कोई ऊचां उद्देश्य है। विश्व के महान लेखक टाल्स्टाय, गोर्की, स्टीफन ज्विग, खलील जिब्रान, चेखोव आदि-आदि ने, जिनकी रचनाएं पाठक इस पुस्तक में पढ़ेंगे, केवल लिखने के लिए कहानियां नहीं लिखीं उनके पास मानव-जाति को देने के लिए संदेश था, इसीलिए उन्होंने कहानियों की रचना की है।हम आशा करते हैं कि सभी पाठक, विशेषकर हमारी नई पीढ़ी, इन कहानियों को अवश्य पढ़ेगी और अपने जीवन को ढालने में इनसे प्रेरणा लेगी।

-सम्पादक

अनुक्रम


लियो टाल्स्टायकितनी जमीन? खलील जिब्रानतूफान
स्टीफन ज्विगधरती की ममता मैक्सिम गोर्कीकोलूशा याशिकी हायामाएक थैला सीमेंट अन्तोन चेखवगिरगिट
लू सुनवह अभागा!
योंग-सू ओप्रवासी चिड़िया अलेक्सान्द्र पुश्किन ताबूतसाज वाशिंगटन इर्विंगदु:ख का वह जीवित स्मारक □□

कितनी जमीन ?
लियो टाल्स्टाय

(विद्वान लेखक की इस कहानी से महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने इसका अनुवाद गुजराती में किया था और इसकी बहुत-सी प्रतियां पाठकों में वितरित कराई थीं। गांधीजी के अपरिग्रह सिद्धान्त का इस कहानी में बड़े मार्मिक ढंग प्रतिपादन हुआ है।

यहां हम हिन्दी के यशस्वी लेखक श्री जैनेन्द्र कुमारजी द्वारा किया हुआ भावानुवाद दे रहे हैं। इसमें उन्होंने पात्रों के नाम बदल दिये हैं और रुसी की जगह रंग भी भारतीय कर दिया है। -सम्पादक)

दो बहने थी। बड़ी का कस्बे में एक सौदागर से विवाह हुआ था। छोटी देहात में किसान के घर ब्याह थी।
बड़ी का अपनी छोटी बहन के यहां आना हुआ। निबटकार दोनों जनी बैठीं तो बातों का सूत चल पड़ा। बड़ी अपने शहर के जीवन की तारीफ करने लगी, ‘‘देखो, कैसे आराम से हम रहते हैं। फैंसी कपड़े और ठाठ के सामान! स्वाद-स्वाद की खाने-पीने की चीजें, और फिर तमाशे-थियेटर, बाग-बगीचे!’’

छोटी बहन को बात लग गई। अपनी बारी पर उसने सौदागर की जिंदगी को हेय बताया और किसान का पक्ष लिया। कहा, ‘‘मैं तो अपनी जिंदगी का तुम्हारे साथ अदला-बदला कभी न करुं। हम सीधे-सादे और रुखे-से रहते हैं तो क्या, चिंता-फिकर से तो छूटे हैं। तुम लोग सजी-धजी रहती हो, तुम्हारे यहां आमदनी बहुत है, लेकिन एक रोज वह सब हवा भी हो सकता है, जीजी। कहावत हे ही—‘हानि-लाभ दोई जुड़वा भाई।’ अक्सर होता है कि आज तो अमीर है कल वही टुकड़े को मोहताज है। पर हमारे गांव के जीवन में यह जोखिम नहीं है। किसानी जिंदगी फूली और चिकनी नहीं दीखती तो क्या, उमर लंबी होती है और मेहनत से तन्दुरुस्ती भी बनी रहती है। हम मालदार न कहलायेगे: लेकिन हमारे पास खाने की कमी भी कभी न होगी।’’

बड़ी बहन ने ताने से कहा, ‘‘बस-बस, पेट तो बैल और कुत्ते का भी भरता है। पर वह भी कोई जिंदगी है? तुम्हें जीवन के आराम, अदब और आनन्द का क्या पता है? तुम्हारा मर्द जितनी चाहे मेहनत करे, जिस हालत में तुम जीते हो, उसी हालत में मरोगे। वहीं चारों तरफ गोबर, भुस, मिट्टी! और यही तुम्हारे बच्चों की किस्मत में बदा है।’’

छोटी ने कहा, ‘‘तो इसमें क्या हुआ! हां, हमारा काम चिकना-चुपड़ा नहीं हैं; लेकिन हमें किसी के आगे झुकने की भी जरुरत नहीं है। शहर में तुम हजार लालच से घिरी रहती हो। आज नहीं तो कल की क्या खबर है! कल तुम्हारे आदमी को पाप को लोभ—जुआ, शराब और दूसरी बुराइयां फंसा सकते हैं, तब घड़ी भर में सब बरबाद हो जायगा। क्या ऐसी बातें अक्सर होती नहीं हैं?’’

घर का मालिक दीना ओसारे में पड़ा औरतों की यह बात सुन रहा था। उसने सोचा कि बात तो खरी है। बचपन से मां धरती की सेवा में हम इतने लगे रहते हैं कि कोई व्यर्थ की बात हमारे मन में घर नहीं कर पाती है। बस, है तो मुश्किल एक। वह यह कि हमारे पास जमीन काफी नहीं है। जमीन खूब हो तो मुझे किसी का परवा न...
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